Thursday, July 28, 2011

हरी घाँस कब आस छोडती है......

.......जैसे सूखते सोते
अचानक भर जाते हैं लबालब,
तुम आओ ! एक बार फिर धमनियों में रक्त की तरह फैल जाओ,
फिर चमक उठेंगी ये बर्फ लदी चोटियाँ 
फिर पिघल जायेंगी ये सफेद चादरें 
बसंत अब लौट आयेगा
हरी घाँस कब आस छोडती है, 
बर्फ कभी न कभी तो पिघलती है,
हरी घांस ये सच जानती है,

तभी हर बार एक बार फिर घुट जाने को उग आती है...

3 comments:

  1. Basant mehsoos karne ko phir se ug aati hai....

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  2. Anonymous ..... Thanks for being here with me...
    कितनी भोली है ... हर बार खिल जाती है..

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  3. bharti tiwari sharmaAugust 11, 2011 at 3:30 AM

    b,ful,apne priytam ke intzar me,m right

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