Wednesday, May 4, 2011

एक तुम्हें पाने की ज़िद.....!!!

एक तुम्हें  पाने की ज़िद थी,
वो भी छोड़ दी मैंने


उम्मीदों में तुम ही थी बस,                         
बाकी तो सब पा ही गया हूँ,                                 
शौक नहीं था पर,
तुम्हारी खातिर,                                 
राग-रंग, शानोशौकत पर छा भी गया  हूँ,
हांसिल है मुझे,
हर आँख को चमकाता,
नज़रों को भाता ,
गर्व से उठाता ,
एक समंदर एक मंज़र,
जबरन बांधी आशायें,
लेकिन मैं  बेबस,
तुम नहीं,
तुमको पाने की जिद भी नहीं,
सिर्फ सन्नाटे,
यादों की लहरों का निरंतर बहता शोर,
खिड़की से ताकते रहकर,
टूटते सितारों से मांगने की आदत छोड़ दी मैंने,
बस  एक तुझे पाने की  ज़िद थी,
वो भी छोड़ दी मैंने......

उन ख्वाबों की,
उन गीतों की,
उन पुराने खतों में उलझे सुलझे,
कहे अनकहे शब्दों की, सवालों की, जवाबों की,
हर दिशा मोड़ दी मैंने.
बस  एक तुम्हें पाने की  ज़िद थी,
वो भी छोड़ दी मैंने......
© 2010 कापीराईट सेमन्त हरीश

11 comments:

  1. and for this i am speechless..... ek ek line and word is countable uncle.. ek dum dil choo jaane waali hai....... kya kya jeed hai hau usse paane ki waah waah padthe hi all the imaginations flows in front.......what a imaginative mind uncle..........

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  2. @Sangeetha Thanks for the thoughtful comments...

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  3. Awesome......Zid chod di maine.....

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  4. >> अति सुन्दर <<

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  5. I m lovin it too !!

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  6. bharti tiwari sharmaAugust 4, 2011 at 7:19 AM

    i love dis

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  7. @Sandhya Patel अति शुक्रिया...

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  8. Anonymous....
    शायद तेरी भी कुछ मजबूरी होगी,
    वरना तुमने ये गुमनामी की ख्वाहिश ना ओढी होती...
    मेरा सादर धन्यवाद...तुमको....

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  9. meri mazboori samazhne ka shukriya dost..
    Gumnaam hai koi
    kisko khabar,kon hai woh,
    anjaan hai koi.......

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  10. hamesha ki tarah....ye lines behad khoobsurat....or main nishabd..
    great Semant sir..

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